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काका हाथरसी

काव्य चर्चा

पद्म श्री काका हाथरसी हास्य और व्यंग्य के हस्ताक्षर

काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में एक हस्ताक्षर रहे काका हाथरसी जीवन की हर परिस्थिति में हास्य का पुट खोज लेते थे। ये जीवन के प्रति उनका घोर विश्वास और प्रेम ही था। 18 सितम्बर 1906 को उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में जन्मे काका का असली नाम प्रभुलाल गर्ग था। संयोग की बात तो यह है कि 1995 में इसी दिन उनकी मृत्यु भी हुई थी। 

काका के पुरखे गोकुल से आकर हाथरस बस गए थे। काका, समाज के कुरीतियों, दोषों और दकियानूसी मान्यताओं और राजनीतिक कुशासनों पर हास्य-व्यंग्य के ज़रिये प्रहार करते हैं। व्यंग्य का मूल उद्देश्य भी यही है कि वह सिर्फ मनोरंजन न करे बल्कि पाठक को सोचने पर मजबूर करे। पाठक व्यंग्य को पढ़कर बौखलाए और परिवर्तन के बारे में सोचे। काका हाथरसी अपने व्यंग्य लेखन के माध्यम से सामजिक बुराइयों के ख़िलाफ़ एक जनमत तैयार करते हैं। काका अपनी पूरी रचनात्मकता में दकियानूसी मान्यताओं और व्यवस्था से पैदा होने वाली विसंगतियों पर पैनी नज़र रखते हैं और उस पर गहरा कटाक्ष करते हैं। उदाहरण के लिये अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार पर काका के व्यंग्य का एक नमूना देखिये - 

बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर
जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई जंज़ीर

खींच लई जंज़ीर, बने गुंडों के नक्कू
पकड़ें टीटी, गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू

गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना
प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
 

या फिर, 

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर
‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर

पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला

कह ‘काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले - भागो, खत्म हो गया आटा 


ये है काका हाथरसी की शैली। आपने कभी ऐसा नहीं सुना होगा कि कोई व्यक्ति मरने से पहले अपनी वसीयत में ये लिख जाए कि, "मेरे मरने के बाद मेरे परिजन या जानने वाले रोएं नहीं बल्कि अट्टहास करके हंसे, ठहाका लगाएं और तब ही मेरी आत्मा को शान्ति मिलेगी"।

1906 में काका के जन्म के समय प्लेग की महामारी फ़ैली थी जिसकी वजह से हजारों लोग काल के गाल में समा गए थे। काका का परिवार भी इस महामारी से अछूता न रह सका। काका केवल 15 दिन के थे कि प्लेग के कारण उनके पिता का निधन हो गया। काका के परिवार पर मानो बिजली टूट पड़ी। बड़े भाई भजनलाल की उम्र उस समय मात्र दो साल थी। माँ बरफी देवी इस व्रजपात से व्याकुल और चिंताग्रस्त हो गईं और अपने बच्चों को लेकर अपने मायके इगलास चली गईं जहां उनके भाईयों ने पूरी सहायता की और काका और उनका भाई अब ननिहाल का अंग बन गए।  जब काका 10 वर्ष के हो गए तब उनके मामा ने उन्हें अपने पास बुला लिया, यानि काका पढ़ने के लिए इगलास चले गए। काका ने इगलास में अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की और उन्हें 6 रुपए प्रति महीने की पहली नौकरी मिली। 

1946 में काका की पहली पुस्तक 'कचहरी' प्रकाशित हुई। काका अब तक हास्य कवि सम्मेलनों में प्रसिद्धि पाने लगे थे और काका की दाढ़ी भी लोकप्रिय हो चुकी थी। काका ने ख़ुद अपनी दाढ़ी-महिमा का बखान इस तरह किया है:- 

काका दाढ़ी राखिए, बिन दाढ़ी मुख सून।
ज्यों मसूरी के बिना, व्यर्थ देहरादून।
व्यर्थ देहरादून, इसी से नर की शोभा।
दाढ़ी से ही प्रगति, कर गए संत विनोबा।।
मुनि वशिष्ठ यदि दाढ़ी, मुँह पर नहीं रखाते।
तो क्या भगवान राम के गुरु बन जाते? 

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