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165 साल बाद अधिक मास पर बन रहें है विशेष संयोग, जानें क्या है ख़ास ?
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क्लैट 2019 : सोशल मीडिया से दूरी बनाकर की तैयारी, पाई 26वीं रैंक, दिए कारगर टिप्स

क्लैट में ऑल इंडिया 26वीं रैंक हासिल करने वाली अदिति सेठ ने सोशल मीडिया से दूरी बनाकर तैयारी की।

16 जून 2019

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Digital Edition

गुजरात से श्रमिकों को लेकर प्रयागराज पहुंची श्रमिक एक्सप्रेस, हर मजदूर से लिया गया 590 रुपया रेल भाड़ा

गुजरात से आए मजदूरों को लेकर श्रमिक एक्सप्रेस ट्रेन बुधवार को प्रयागराज जंक्शन पहुंची। यहां पर सभी श्रमिकों की थर्मल स्क्रीनिंग की गई। इसके बाद उन्हें बसों के माध्यम से उन्हें उनके गंतव्य तक भेजा गया। प्रत्येक श्रमिक से रेलवे द्वारा 590 रुपया किराया भी वसूला गया।

गुजरात और पंजाब से चार स्पेशल ट्रेनों से 4554 श्रमिक लाए गए। ट्रेन में प्रयागराज के अलावा आसपास के जिलों के भी मजदूर शामिल रहे। यहां भोजन कराने तथा चिकित्सीय परीक्षण के बाद सभी को बसों से उनके गृह जनपद भेजा गया। स्थानीय श्रमिकों को भी बसों तथा अन्य वाहनों से भेजा गया। सभी को स्कूलों या घरों में 21 दिनों के लिए क्वारंटीन कराया गया है। इस दौरान वे घरों से बाहर नहीं निकल सकेंगे।
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दाहोद जेल तोड़कर भागे 13 कैदियों में से नौ गिरफ्तार

अपने घर-गांव की कीमत समझ आ गई साहब अब मर जाएंगे पर बाहर नहीं जाएंगे

गुजरात में सबकुछ गंवाकर लौटे मजदूरों ने कहा- अब किस्मत में जो लिखा होगा घर पर ही बर्दाश्त करेंगे
पूरा मेहनताना नहीं दिया और लंबे सफर पर भूखे पेट ही भगा दिया

बरेली। अपना घरबार छोड़कर कामधंधे के लिए देश में प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा कमाई वाले राज्य गुजरात पहुंचे मजदूरों ने यूं तो खुद ही वहां अपनी जिंदगी में बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं थी लेकिन लॉकडाउन शुरू होने के बाद उन पर जो बीती, उसका दाग उनके चेहरों पर घर लौटने की खुशी के पीछे भी नहीं छिप पाया। ईंट भट्ठों पर काम करने वाले ज्यादातर मजदूरों का काम लॉकडाउन होते ही छिन गया। मालिकों ने रोजी के साथ रोटी भी बंद कर दी। घर आने का कोई जरिया न होने के बावजूद उन पर दबाव बनाते रहे कि वे फौरन ईंट भट्ठे के आसपास बनी झोपड़ियां खाली करके निकल जाएं। कई मजदूरों ने बताया कि लौटते वक्त उनके मालिक ने मजदूरी के पूरे पैसे तक नहीं दिए।
साबरमती एक्सप्रेस में करीब 20 घंटों का सफर करके करीब 11 सौ मजदूर बरेली जंक्शन पर उतरे तो चेहरों पर राहत के भाव दिखने के बावजूद दिल दहला देने वाली कई कहानियां उनकी जुबां पर थीं। अमर उजाला से बातचीत के दौरान आपबीती बताते हुए कई मजदूरों के गले तक रूंध गए। मजदूरों ने बताया कि डेढ़ महीने से वे लोग अपने मालिकों की बदसलूकी झेल रहे थे। सरकार ने उनके लौटने के लिए ट्रेन का बंदोबस्त किया तो उन्हे उम्मीद थी कि वे वापस आते वक्त उनके राशन-खाने का इंतजाम करेंगे लेकिन उन्होंने एक वक्त का खाना तक नहीं दिया। मजदूरों ने कहा कि वे अपने घर पर अब चाहे जिस हाल में रहें लेकिन कभी लौटकर गुजरात नहीं जाएंगे।

रेल का किराया माफ फिर भी ठेकेदारों ने कर दीं जेबें साफ

केंद्र सरकार ने तो दूसरे राज्यों से लौटने वाले मजदूरों का रेल किराया माफ कर दिया लेकिन ठेकेदार और एनजीओ फिर भी उनकी जेबें खाली कराने से बाज नहीं आए। जंक्शन पर उतरे मजदूरों ने बताया कि ठेकेदार ने टिकट के नाम पर उनसे एक-एक आदमी के पांच सौ रुपये से लेकर आठ सौ रुपये तक रखवा लिए। बड़े परिवारों के साथ लौटे कई मजदूरों के जेब की पूरी रकम इसी में निकल गई। मजदूरों ने बताया कि जिस एनजीओ को उन्हें सूची बनाकर ट्रेन में बैठाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, उसके लोगों ने यह काम ठेकेदारों के ही सुपुर्द कर दिया। ठेकेदारों ने उन्हें बताया कि एनजीओ ने उनसे पैसे मांगे हैं। कुछ ठेकेदारों ने टिकट के पूरे 525 रुपये लिए तो कुछ ने वहां ट्रेन में सवाल होने से पहले हुई थर्मल स्क्रीनिंग को मेडिकल परीक्षण बताकर आठ सौ रुपये तक ले लिए। हालांकि पश्चिम रेलवे के एक अधिकारी ने आधिकारिक बयान देने से इनकार करते हुए बताया कि किसी भी श्रमिक से रेलवे ने कोई किराया नहीं वसूला है। रेलवे के पास मजदूरों की संख्या के हिसाब से केंद्र सरकार ने पहले ही पैसा भेज दिया था। अगर किसी और ने मजदूरों से वसूली की है तो उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

लॉकडाउन के बाद एक-एक दिन मुश्किल से कटा

हम जिस ईंट भट्ठे पर काम करते थे, उसका मालिक लॉकडाउन के बाद लगातार हम लोगों पर यूपी वापस लौटने का दबाव बना रहा था। एक-एक दिन बहुत मुश्किल से कटा। अब यहां आकर काफी सुकून महसूस हो रहा है। - मुन्नी, बल्लिया बरेली
मैं गुजरात में एक धागा बनाने वाली फैक्टरी में काम कर रहा था। कई दिन से पूरा परिवार भूखा था। आते वक्त भी मालिक ने भूखे पेट ही भेज दिया। कुछ पैसा भी मालिक पर बकाया था लेकिन उसने देने से साफ इनकार कर दिया। -हरीश चंद्र, प्रयागराज
गुजरात में काफी समय से मेहनत मजदूरी कर रहा था। लॉकडाउन हुआ तो ऐसी मुसीबतें झेलीं जो पूरी जिंदगी याद रहेंगी। परिवार को खाना खिलाने लायक तक पैसे पास में नहीं बचे। अब अपने घर लौटते हुए जो सुकुन मिला है, उसे बयां नहीं कर सकता।- सूरज पटेल, बनारस
कई हफ्तों से प्रयागराज में अपने घर लौटने के लिए परेशान था। धागा मिल मालिक ने काम बंद करा दिया था और खाने तक को पैसा नहीं दे रहा था। सरकार ने ट्रेन चलाकर बहुत उपकार किया है। - विजयचंद्र, प्रयागराज
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युद्धपोत आईएनएस विराट गुजरात के अलंग तट पहुंचा, किया जाएगा नष्ट

नौसेना में सबसे लंबे समय तक सेवा देना वाला युद्धपोत आईएनएस विराट मंगलवार का गुजरात के अलंग तट पर पहुंचा, जहां इसे नष्ट (डिसमेंटल) किया जाएगा। तीन साल पहले नौसेना ने आईएनएस विराट को सेवानिवृत्त कर दिया था। आईएनएस विराट ने शनिवार को मुंबई के नौसेना डॉकयार्ड से आखिरी यात्रा शुरू की थी और सोमवार शाम यह भावनगर के अलंग पहुंच गया था। अलंग के शिप ब्रेकिंग यार्ड में इसे नष्ट किया जाएगा और स्क्रैप के तौर पर इसकी बिक्री की जाएगी।

38.54 करोड़ रुपये में गुजरात की कंपनी ने खरीद था
नौसेना में 1987 में शामिल किए गए आईएनएस विराट को श्रीराम ग्रुप ने इस साल हुई नीलामी में 38.54 करोड़ रुपये में खरीदा था। ग्रुप के चेयरमैन मुकेश पटेल ने बताया, सरकारी अधिकारी शिप ब्रेक्रिंग कोड के तहत जहाज को नष्ट करने की औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद 28 सितंबर से इसे नष्ट करने का काम शुरू होगा।
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आईएनएस विराट आईएनएस विराट

गुजरात में गोरधन झड़फिया पर दाउद के हमले की साजिश से तेज होगी ध्रुवीकरण की सियासत, पुलिस ने उन्हें क्यों बताया हिंदू नेता!

गुजरात में पूर्व गृह राज्य मंत्री गोरधन झड़फिया की हत्या की साजिश को क्या हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण का राजनीतिक रंग देना शुरू कर दिया गया है और इसकी शुरुआत खुद गुजरात पुलिस ने अपने पहले ट्वीट से की है। बुधवार को गुजरात पुलिस ने अहमदाबाद के एक होटल से दाउद इब्राहिम के दाहिने हाथ छोटा शकील के शार्प शूटर इरफान को गिरफ्तार करके जो खुलासा किया वह डराने वाला है।

पुलिस के मुताबिक इरफान और उसका एक साथी राज्य के पूर्व गृह राज्य मंत्री और भाजपा नेता गोरधन झड़फिया की हत्या करने वाले थे, लेकिन पुलिस को यह जानकारी मिल गई और इस साजिश को विफल कर दिया गया। लेकिन इस मामले की जानकारी देने के लिए पुलिस ने जो पहला ट्वीट किया उसमें झड़फिया का परिचय राज्य के पूर्व गृह मंत्री और भाजपा नेता के रूप में न देकर हिंदू नेता के रूप में दिया है।
इस मामले का एक सियासी पहलू भी है। गोरधन झड़फिया पटेलों के बेहद लोकप्रिय नेता हैं। अगर उन पर किसी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी संगठन या दाउद और छोटा शकील जैसे अपराधी गिरोह हमला करते हैं, तो इससे गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ पटेलों में जबर्दस्त गुस्सा पैदा होगा। साथ ही क्योंकि झड़फिया 2002 में गृह राज्य मंत्री थे, जब गोधरा कांड के बाद हिंदुत्व का ज्वार फूटा था। उनकी विश्व हिंदू परिषद और प्रवीण तोगड़िया से नजदीकी भी जगजाहिर रही है। इसलिए उनकी एक हिंदू नेता की पुरानी छवि को फिर से पेश करके हिंदुत्व का ज्वार भी फिर पैदा हो सकता है। क्या इसीलिए गुजरात पुलिस ने अपने पहले ट्वीट में उन्हें हिंदू नेता बताया। जबकि उनकी पहचान हिंदू नेता से ज्यादा पूर्व गृह राज्य मंत्री और पाटीदार नेता की ज्यादा है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक गोरधन झड़फिया को मारने आए छोटा शकील के शूटर की गिरफ्तारी से भाजपा को एक बड़ा राजनीतिक हथियार हाथ लग गया है। पार्टी इसे जितना मुद्दा बनाएगी उसका नुकसान सीधे कांग्रेस को होगा, जो हार्दिक पटेल के जरिए पटेलों को अपनी ओर लाने की पुरजोर कोशिश में है। राज्य में कई विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव और मध्य प्रदेश विधानसभा उपचुनावों में भी झड़फिया का मुद्दा हिंदू ध्रुवीकरण में मदद कर सकता है।

गुजरात पुलिस जब इस साजिश की जानकारी मीडिया को दे रही थी, उस समय गोरधन झड़फिया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल के साथ सौराष्ट्र के दौरे पर थे। उन्होंने फोन पर अमर उजाला को बताया कि यह मामला उन्हें भी चौंकाता है, क्योंकि इसके पहले उन्हें कभी कोई धमकी नहीं मिली। लेकिन अगर पुलिस ने किसी को गिरफ्तार किया है, तो जरूर उसका आधार होगा। सवाल है कि झड़फिया आखिर दाउद गिरोह के निशाने पर क्यों हैं। कहा जा रहा है कि वह तब राज्य के गृह मंत्री थे, उसी समय गोधरा कांड हुआ और उसके बाद मुसलमानों के खिलाफ राज्यव्यापी हिंसा हुई।

लेकिन इतने लंबे अंतराल के बाद झड़फिया की हत्या की साजिश थोड़ा इसलिए भी चौंकाती है कि 2002 के विधानसभा चुनावों के बाद से ही गोरधन झड़फिया राज्य भाजपा में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध के प्रतीक बन गए थे। उन्होंने न सिर्फ राजभवन में मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण में अपना नाम पुकारे जाने पर वहीं खड़े होकर शपथ लेने से इंकार कर दिया, बल्कि उसके बाद भाजपा के भीतर मोदी विरोधियों को गोलबंद करने में जुट गए। 2002 से लेकर दिसंबर 2007 के विधानसभा चुनावों तक गोरधन झड़फिया ने भाजपा के मुख्य जनाधार राज्य के ताकतवर पाटीदार समुदाय (पटेल) को पूरे गुजरात में घूम-घूम कर मोदी के खिलाफ गोलबंद किया। करीब तीन दर्जन भाजपा के विधायकों और पूर्व सांसदों के साथ उन्होंने भाजपा छोड़ी और अपने तमाम साथियों को कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़वाया।

2007 का विधानसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए सबसे मुश्किल चुनाव था, जिसमें घर में बैठकर केशूभाई पटेल और भाजपा के कांशीराम राणा, सुरेश मेहता, वल्लभ भाई कथीरिया, सिद्धार्थ पटेल, बाबू भाई उंघाड़ जैसे तमाम दिग्गज नेता खुलकर मोदी और भाजपा के खिलाफ झड़फिया और कांग्रेस के समर्थन में थे।

सिर्फ भाजपा ही नहीं गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक पदाधिकारी भी खुलेआम भाजपा उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव प्रचार में सक्रिय थे। विश्व हिंदू परिषद के तत्कालीन कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण भाई तोगड़िया और भाजपा से अलग होकर अपनी पार्टी बना चुकी उमा भारती भी मोदी और भाजपा के खिलाफ सक्रिय थे।

इस पूरे मोदी विरोध की कमान और केंद्र बिंदु गोरधन झड़फिया ही थे। दिल्ली में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से उनका सीधा संवाद था। लेकिन 2007 की इस कठिन चुनौती से मुकाबला करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने करिश्मे और मेहनत से चुनाव में जीत दर्ज की। इसके बाद मोदी विरोध मंद पड़ गया। लेकिन गोरधन झड़फिया ने अपनी मुहिम जारी रखी और 2012 के विधानसभा चुनावों में झड़फिया ने केशूभाई पटेल के नेतृत्व में अलग पार्टी बनाकर कांग्रेस के साथ एक रणनीतिक समझदारी के तहत हर विधानसभा सीट पर उम्मीदवार उतारे।

इस बार केशूभाई पटेल खुलकर मैदान में थे। लेकिन तब तक साबरमती और नर्मदा में काफी पानी बह गया था और नरेंद्र मोदी हर गुजराती की इस आकांक्षा का प्रतीक बन चुके थे कि गुजरात का बेटा देश का पंत प्रधान (प्रधानमंत्री) बने। यह विधानसभा चुनाव मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने इसी गुजराती आकांक्षा को मुद्दा बनाकर जीता और केशूभाई पटेल व गोरधन झड़फिया की पार्टी को महज चार सीटें मिलीं।

इसके बाद केशूभाई पटेल घर बैठ गए और करीब डेढ़ साल सियासी बियाबान में बिताने के बाद गोरधन झड़फिया ने 2013 के आखिर में संघ के कुछ शीर्ष नेताओं की मदद से भाजपा में वापसी कर ली। उन्होंने नरेंद्र मोदी और अमित शाह को अपना नेता मान लिया।हालांकि कभी अमित शाह झड़फिया से राजनीतिक रूप से कनिष्ठ थे। लेकिन 2013 में शाह को मोदी के प्रभाव से भाजपा का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया था और उनकी राष्ट्रीय विकास यात्रा शुरू हो चुकी थी।

उसके बाद से झड़फिया पूरी तरह भाजपा और मोदी के प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा ने पाटीदारों में उनकी लोकप्रियता का इस्तेमाल हार्दिक पटेल की चुनौती से निबटने में किया और झड़फिया काफी हद तक पटेलों को वापस भाजपा की तरफ लाने में कामयाब भी रहे।

2019 के लोकसभा चुनावों झड़फिया को भाजपा ने उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाया और वहां भी उन्होंने अपनी संगठन क्षमता का अच्छा प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्हें भाजपा किसान मोर्चे का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। फिलहाल गोरधन झड़फिया गुजरात में भाजपा को मजबूत बनाए रखने में जुटे हुए हैं। लेकिन भाजपा की समस्या है कि मोदी और शाह के दिल्ली आ जाने के बाद राज्य भाजपा के नेताओं की गुटबाजी काबू में नहीं आ रही है।

मुख्यमंत्री पद से आनंदी बेन पटेल की छुट्टी और उसके बाद पटेलों के कद्दावर नेता नितिन पटेल को दरकिनार करके विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री बनाए जाने से पाटीदार समाज चुनाव से पहले से ही असहज रहा है। हाल ही में जीतू वाघाणी की जगह महाराष्ट्र से आकर सूरत में बसे सीआर पाटिल को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने से पटेलों की नाराजगी और बढ़ गई है।

उधर कांग्रेस ने पाटीदार आरक्षण आंदोलन के युवा नेता हार्दिक पटेल को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर पटेलों को अपने साथ जोड़ने का दांव चल दिया है। जबकि विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता का पद भी सौराष्ट्र के मजबूत पाटीदार विधायक परेश धनानी के पास है। हार्दिक ने पूरे गुजरात में अपने दौरे तेज करके पटेलों को कांग्रेस के साथ जोड़ने की मुहिम तेज कर दी है।

ऐसे में भाजपा के लिए गोरधन झड़फिया की उपयोगिता और महत्व बेहद बढ़ गया है। अपनी जिम्मेदारी समझ कर गोरधन झड़फिया प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीआर पाटिल के साथ पटेल बहुल सौराष्ट्र इलाके में लगातार दौरे कर रहे हैं। ऐसे समय में अचानक छोटा शकील के शूटर का अहमदाबाद में झड़फिया की हत्या के लिए आना चिंता पैदा करता है। गनीमत यह है कि पुलिस सतर्क थी और साजिश का भंडाफोड़ हो गया। लेकिन इरफान का दूसरा साथी फरार हो गया है, जो झड़फिया और गुजरात सरकार के लिए चिंता का सबब है।

इस पूरे मामले में कुछ सवाल भी उठते हैं। पहला सवाल है कि 2002 के तुरंत बाद जब झड़फिया मोदी के खिलाफ मैदान में उतर गए और भाजपा से भी बाहर हो गए तब उनकी सुरक्षा न के बराबर थी। कितनी बार वह दिल्ली के गुजरात भवन में पत्रकारों से घंटों बात करते थे। गुजरात और उसके बाहर भी वह बिना किसी सुरक्षा तामझाम के घूमते थे। लेकिन तब उन पर हमले की कोई कोशिश नहीं हुई।

इसका जवाब यह दिया जा सकता है कि तब क्योंकि वह मोदी और भाजपा के खिलाफ थे, इसलिए वह आतंकवादियों और दाउद जैसे माफिया के निशाने से हट गए। लेकिन बाद में जब वह भाजपा में शामिल होकर मोदी और शाह के वफादार सिपहसालार हो गए हैं, तो 2002 की हिंसा को लेकर उन पर खतरा बढ़ गया है। गोरधन झड़फिया को बेहद सतर्क और सावधान रहने की जरूरत है। गुजरात सरकार को झड़फिया जैसे लोकप्रिय और विचारवान नेता की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
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यूपी में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति की बने सूची, 15 दिन कराया जाए क्वारंटीन: हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कोरोना महामारी से निपटने के लिए राज्य की सीमाओं पर कड़ी निगरानी करने का निर्देश दिया है। कहा है कि यूपी में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति की सूची बनाई जाए और उनकी कड़ी निगरानी की जाए। बाहर से आने वाले हर व्यक्ति को 15 दिन के लए अनिवार्य रूप से क्वारंटीन किया जाए तथा उनके स्वास्थ्य की निगरानी के लिए हर चार सौ व्यक्ति पर एक अधिकारी की नियुक्ति की जाए। कोर्ट ने इन निर्देशों का कड़ाई से पालन करने और कार्यवाही रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है। 

प्रयागराज में कोरोना से इंजीनियर की मृत्यु और क्वारंटीन सेंटरों की दुर्दशा की शिकायत को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर तथा न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा की खंडपीठ सुनवाई कर रही है। इससे पूर्व अदालत ने प्रदेश सरकार से जिले के 11 सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं का ब्योरा तलब किया था।
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गुजरात से आए 2439 श्रमिक, महाराष्ट्र से भी आने लगे मजदूर

इलाहाबाद हाईकोर्ट

Pratapgarh: स्पेशल ट्रेन से सूरत से बेल्हा पहुंचे 1354 श्रमिक, 110 श्रमिकों को रखा शेल्टर होम में

बड़ौदा से प्रयागराज पहुंचे 1301श्रमिक, प्रत्येक से लिए गए 575 रुपये

दूसरे राज्यों से श्रमिकों के आने का सिलसिला शनिवार को भी जारी रहा। गुजरात के बड़ौदा से विशेष ट्रेन 1301 श्रमिकों व उनके परिवार को लेकर जंक्शन पहुंची। श्रमिकों ने बताया कि उनसे सबसे 575 रुपये किराया लिया गया है। बताया, बड़ौदा में रजिस्ट्रेशन के समय ही यह राशि ले ली गई थी, जबकि रेलवे व प्रशासन लगातार कोई किराया नहीं लेने की बात कह रहा है। 

वहीं जंक्शन पर शनिवार को उतरे श्रमिकों को 41 बसों से उनके गृह जनपद भेजा गया। इससे पहले सभी का चिकित्सीय परीक्षण कराया गया। रविवार को भी दो ट्रेनों से श्रमिक आएंगे। बता दें कि अब तक कुल आठ ट्रेनों से श्रमिक आ चुके हैं। इनमें सात गुजरात से आईं हैं। इसी क्रम में बड़ौदा से चली ट्रेन शनिवार सुबह 7.22 बजे जंक्शन पर पहुंची।
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समझ से परे है रेलवे का 85 फीसदी से किराया छोड़ने का गणित 

एक मई से चलाई गईतमाम श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सफर करने वाले मजदूरों के लिए रेलवे द्वारा 85 फीसदी  एवं राज्य सरकार द्वारा 15 फीसदी किराया वहन करने करने की बात की जा रही है।लेकिन इन ट्रेनों से सफर करके पहुंचे सैकड़ों मजदूरों के पास उपलब्ध टिकट कुछ औरही बयां कर रहे हैं। इन श्रमिकों को कहना है कि वह जिस स्थान से ट्रेन पकड़कर चढ़ेथे, वहां संबंधित राज्य सरकार नेटिकट की एवज में उनसे किराया लिया। प्रयागराज पहुंचे श्रमिकों ने अपने टिकट भीदिखाए। 

प्रयागराजमें अब तक सात श्रमिक स्पेशल आ चुकी हैं। आठवीं श्रमिक स्पेशल गुजरात के वडोदरा सेशनिवार की सुबह आ रही है। इसके पूर्व सात में से छह श्रमिक स्पेशल गुजरात से हीआई। इसमें भी चार स्पेशल सूरत से आई। इस ट्रेन से आए श्रमिकों के पास जो टिकट रहेउसमें सूरत से प्रयागराज तक किराया 595 रुपये अंकित था।  कुछ श्रमिकों का आरोप था कि सूरत में इस टिकट केलिए ठेकेदारों एवं कुछ अन्य लोगों ने 700 से एक हजार रुपये तक वसूले। वहीं रेलवे अफसरों काकहना है कि रेलवे बोर्ड की गाइड लाइन है कि वह टिकटों को प्रशासन के हवाले करेगाऔर प्रशासन ही वह टिकट श्रमिकों को उपलब्ध कराएगा।

डीआरएम प्रयागराज अमिताभ भीइसकी पुष्टि दो दिन पहले कर चुके हैं। उधर रेलवे द्वारा किराये में जो 85 फीसदी की छूट देने की बात कही गई है उसका गणित कुछओर ही है। दरअसल रेलवे आमतौर पर जो किराया यात्रियों से लेती है उसमें 40 से 43 फीसदी की सब्सिडी शामिल होती है। अभी श्रमिकस्पेशल जो चल रही हैं उसमें सामाजिक दूरी यात्रियों के बीच बनी रहे तो सभी सीटेंबुक नहीं की जा रही है। यानी कि अगर किसी स्लीपर कोच में 80 बर्थ है तो उसमें 50 बर्थ ही यात्रियों को आवंटित की जा रही हैं।

इसमें दोनों मिडिल बर्थ और एक साइड अपर बर्थ बुक नहीं की जा रही। इतना ही नहीं ट्रेनखाली होने के बाद वापस अपने गंतव्य स्टेशन तक जाती है। इस दौरान ऑपरेटिंग का जोखर्चा आ रहा है वह भी इसमें जोड़ा जा रहा है। इसी कुल खर्च को जोड़कर 85 फीसदी दिखाने का प्रयास किया गया है। हालांकिरेलवे अफसर इस बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। हालांकि किराये में छूट कारेलवे की ओर से कोई सर्कुलर भी जारी नहीं किया गया है। ऐसे में इस बात के कयासलगाए जा रहे हैं कि किराये में 85 फीसदी की छूट किसी भ्रामक जानकारी से कम नहीं है।
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