फिर एक निर्भया

सीता वांका Updated Tue, 03 Dec 2019 08:28 AM IST
विज्ञापन
बलात्कार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन
बलात्कार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन - फोटो : a

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
देश के सबसे सनसनीखेज निर्भया बलात्कार और हत्या मामले के करीब सात साल बाद हैदराबाद में बलात्कार के बाद हत्या की वैसी ही एक घटना हुई। एक सरकारी पशु चिकित्सक का चार लोगों ने अपहरण कर बलात्कार किया, फिर हत्या करके उसे जला दिया। घटनाक्रम से पता चलता है कि यह एक सुनियोजित अपराध था। आरोपियों की पहचान ट्रक के कर्मचारियों के रूप में हुई है, जिन्होंने युवती को शाम को एक टोल प्लाजा के पास अपनी स्कूटी खड़ी करते देखा था। वह युवती वहां से कैब लेकर शहर की तरफ गई थी। आरोपियों ने यौन-शोषण की साजिश रची और उसकी स्कूटी की टायर पंक्चर कर दी। लौटने पर उस युवती ने जब देखा कि उसकी स्कूटी का टायर पंक्चर है, तो उसने अपनी बहन को फोन पर बताया। उसने कुछ लोगों द्वारा उसकी मदद के लिए आगे आने के बारे में बताया और यह भी कहा कि वह डरी हुई थी और उसे नुकसान की आशंका थी। बाद में जब उसकी बहन ने उसे फोन करने की कोशिश की, तो उसका फोन स्विच ऑफ आ रहा था। प्रारंभिक पुलिस जांच से पता चलता है कि आरोपियों ने उसे ट्रक के पीछे खींच लिया, उसका यौन उत्पीड़न किया और उसकी हत्या कर दी। बाद में वे उसकी लाश को ट्रक में ले गए और जला दिया। अगली सुबह एक दूधिये की सूचना पर पुलिस ने लाश बरामद की। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया है और लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।
विज्ञापन

महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न, बलात्कार और हत्या जैसे संगीन अपराधों से फिर यह सवाल उठता है कि ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं,  एक समाज और व्यवस्था के रूप में भारत क्यों विफल हो रहा है और लोग ऐसे जघन्य अपराधों में क्यों लिप्त होते हैं। लेसली उडविन की डॉक्यूमेंटरी फिल्म इंडियाज डॉटर ऐसे लोगों की मानसिकता को जानने का एक गंभीर प्रयास है, जो ऐसे अपराधों में लिप्त होते हैं। डॉक्यूमेंटरी में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि अपराधी मानते हैं कि महिला और पुरुष समान नहीं हैं, इसलिए महिलाएं पुरुषों की तरह सार्वजनिक स्थानों पर नहीं जा सकतीं। ऐसे अपराधों की जड़ में पितृसत्तात्मक मानसिकता है। यह समझने की जरूरत है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न एक बीमारी का लक्षण है, जिसमें लड़कियों को लड़कों से कमतर समझा जाता है। कन्या भ्रूणहत्या और घरेलू हिंसा के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। जो पुरुष पितृसत्तात्मक मानसिकता में बड़े होते हैं और ज्यादा शिक्षा हासिल नहीं कर पाते, वे आम तौर पर मानते हैं कि वे महिलाओं से बेहतर हैं और इसलिए उन्हें अपनी इच्छा पूरी करने का हक है। हमें अपने बेटों को न केवल घर में, बल्कि बाहर भी महिलाओं के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने की सीख देने की जरूरत है।
लैंगिक समानता को वास्तविक अर्थों में लागू करने के लिए एक समाज के रूप में भी हमें बदलने की जरूरत है। हमें बलात्कार के दोषियों के खिलाफ अपनी कानूनी प्रक्रिया को मजबूत बनाने की भी आवश्यकता है। यह कहना इसलिए जरूरी है कि सात साल बीत जाने के बाद भी निर्भया मामले के दोषियों को अब तक फांसी नहीं दी गई है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें दोषी ठहराया है। लंबी कानूनी प्रक्रिया आम लोगों में कानून के प्रति भरोसे को कमजोर करती है। बलात्कार के मामलों की सुनवाई के लिए देश भर में फास्ट ट्रैक कोर्ट या विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना इस दिशा में सही कदम है। ऐसे जघन्य अपराधों में समाज कानून में अपनी गहरी आस्था रखता है और  निर्णय की अपेक्षा करता है, जो एक निवारक के रूप में कार्य कर सकता है। दिल्ली के निर्भया बलात्कार मामले के बाद आपराधिक कानून (संशोधन) विधेयक, 2013 (निर्भया कानून) पारित किया गया था। उसमें नियमों को सख्त बनाया गया था और घूरने, पीछा करने तथा एसिड हमले जैसे नए अपराधों को उसके दायरे में लाया गया था। तब यह माना गया था कि सख्त कानून ऐसे अपराधों की रोकथाम करेंगे। लेकिन हैदराबाद की डॉक्टर बिटिया के बलात्कार और हत्या का मामला स्पष्ट बताता है कि जब तक कानून को लागू नहीं किया जाता और दोषियों को सजा नहीं दी जाती, सिर्फ कागजों पर कानून बदलने से जमीनी स्तर पर वास्तविकता नहीं बदल सकती। ऐसे मामलों के दोषियों को मृत्युदंड देकर ही सख्त संदेश दिया जा सकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न तो हैदराबाद के सांसद ने और न किसी राजनीतिक दल के नेताओं ने इस घटना की निंदा की या संज्ञान लिया, जबकि अभी संसद का सत्र चल रहा है। ऐसी घटनाओं को रोकने में पुलिस मशीनरी की अहम भूमिका होती है। हालांकि यह ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है कि पीड़ित के परिजनों ने दावा किया है कि शुरू में पुलिस ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण काफी समय बर्बाद हुआ। उनका कहना है कि शिकायत दर्ज कराने के लिए उन्हें एक थाने से दूसरे थाने में भेजा गया। बेशक अधिकार क्षेत्र का मुद्दा महत्वपूर्ण है, लेकिन संज्ञेय अपराधों से संबंधित शिकायत को अधिकार क्षेत्र का खयाल न करते हुए दर्ज करना भी महत्वपूर्ण है। ऐसे जघन्य अपराधों में अगर पुलिस तेजी से कार्रवाई करती है, तो पीड़िता को बचाने की संभावना ज्यादा रहती है।
हमें एक समाज और व्यवस्था के रूप में ऐसे अपराध और अपराधियों के खिलाफ खड़े होने की जरूरत है। इस मामले में न्याय ऐसा होना चाहिए, जो निवारक के रूप में कार्य करे। सुरक्षा उपायों के बारे में महिलाओं में जागरूकता पैदा करना महत्वपूर्ण है। सुरक्षा ऐप्स और हेल्पलाइन के बारे में ज्यादा जागरूकता की जरूरत है। इसके अलावा ज्यादा महिला सुरक्षा केंद्र और आपातकालीन हेल्पलाइन की भी आवश्यकता है, ताकि संकटग्रस्त महिला तक तेजी से पहुंचा जा सके। इस संदर्भ में पुलिस को त्वरित कार्रवाई और पेट्रोलिंग के बारे में शिक्षित करना महत्वपूर्ण है। निस्संदेह यह सुनिश्चित करने के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है कि महिलाओं की सुरक्षा सर्वोपरि है। यह हैरान करने वाला है कि 92  फीसदी निर्भया फंड का उपयोग ही नहीं हुआ, जो इस मामले में राजनेताओं की बेरुखी को ही दर्शाता है।

-हैदराबाद विश्वविद्यालय में स्कूल ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज ऐंड सेंटर फॉर वुमेन स्टडीज में प्रोफेसर।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us