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जीडीपी आधार वर्ष बदलने पर मची है खींचतान, ऐसे पड़ता है अर्थव्यवस्था पर असर

बिजनेस डेस्क, अमर उजाला Updated Mon, 11 Nov 2019 10:05 AM IST
why changing of gdp base year will have long impact on economy
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पिछले साल जीडीपी वैल्युएशन का तरीका बदलने पर तो अब नया आधार वर्ष लाने को लेकर केंद्र सरकार की काफी आलोचना हो रही है। सांख्यिकी और कार्यक्त्रस्म क्त्रिस्यांवयन मंत्रालय सकल घरेलू उत्पाद गणना की नई सीरीज के लिए नए आधार वर्ष पर निर्णय लेगा। आर्थिक विकास दर की गणना के लिए मंत्रालय 2017-18 को नया बेस ईयर बनाने पर विचार कर रहा है। इस बारे में गठित विशेषज्ञों की समिति अभी और आंकड़ों का इंतजार कर ही है। भले ही इस मामले में अभी अंतिम निर्णय नहीं हुआ है लेकिन विपक्ष तो निशाना साध ही रहा है और कुछ अर्थशास्त्री भी इस पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। आखिर क्या करना चाह रही है और इसके क्या मायने हैं, जानिए...

क्या होती है जीडीपी

किसी देश में एक निर्धारित समय अंतराल में तैयार सभी वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक या बाजार मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कहते हैं। यह किसी देश के घरेलू उत्पादन का विस्तृत मापन होता है और इससे अर्थव्यवस्था के आकार के बारे में पता चलता है। वैसे तो इसकी गणना सालाना होती है लेकिन भारत में इसे हर तीन महीने यानी तिमाही में भी आंका जाता है।

कैसे मापते हैं

जीडीपी तीन तरह से मापी जा सकती है। आपूर्ति अथवा उत्पादन पद्धति, आय पद्धति और मांग अथवा खर्च पद्धति से मापी जा सकती है। इसके दो प्रकार होते हैं - नॉमिनल जीडीपी और रियल जीडीपी। नॉमिनल जीडीपी की गणना वर्तमान मूल्य पर की जाती है। यह सभी आंकड़ों का एक कच्चा योग होती है। वहीं, रियल जीडीपी में महंगाई के असर को भी समायोजित किया जाता है। भारत में जो आंकड़े जारी किए जाते हैं, वह रियल जीडीपी के होते हैं।

आर्थिक विकास का पैमाना

जीडीपी किसी देश के आर्थिक विकास का सबसे बड़ा पैमाना है। अगर जीडीपी बढ़ती है तो इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ रहा है। देश में ज्यादा रोजगार पैदा हो रहे हैं। यानी इससे आर्थिक समृद्धि के संकेत मिलते हैं। जब जीडीपी में राष्ट्रीय जनसंख्या का भाग देते हैं तो प्रति व्यक्ति यानी पर कैपिटा जीडीपी निकलती है।
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भारत में कृषि, उद्योग और सेवा तीन अहम हिस्से हैं, जिनके आधार पर जीडीपी तय होती है। इसके लिए देश में जितना भी व्यक्तिगत उपभोग होता है, जितना निवेश होता है और सरकार देश में जितना खर्च करती है, इन सबको जोड़ दिया जाता है। इसके अलावा कुल निर्यात में से कुल आयात को घटा दिया जाता है और इस तरह जो आंकड़ा सामने आता है,  उसे भी ऊपर किए गए खर्च में जोड़ दिया जाता है। यही देश की कुल जीडीपी होती है।

कौन मापता है

जीडीपी को मापने की जिम्मेदारी सांख्यिकी और कार्यक्त्रस्म क्त्रिस्यांवयन मंत्रालय के तहत आने वाले सेंट्रल स्टेटिस्टिक्स ऑफिस यानी केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की है। यह पूरे देश से आंकड़े जुटाता है और उनकी कैलकुलेशन कर जीडीपी का आंकड़ा जारी करता है। 

क्यों बदलता रहता है आधार वर्ष

जीडीपी को तय करने के लिए आधार वर्ष तय किए जाते हैं। यानी उस आधार वर्ष में देश का जो कुल उत्पादन था,  उसकी तुलना में अर्थव्यवस्था का आकार कितना बढ़ा है या घटा है,  उसे ही जीडीपी दर माना जाता है।

सरकार समय-समय पर आधार वर्ष में बदलाव इसलिए करती है ताकि अर्थव्यवस्था के बारे में आंकड़ों का दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं से तालमेल रखा जा सके। इसे अर्थशास्त्री भी जरूरी मानते हैं। ऐसा माना जाता है अर्थव्यवस्था के सही आकलन के लिए हर पांच साल पर बेस ईयर बदल देना चाहिए। साल 2015 में सरकार ने जीडीपी सीरीज का बेस ईयर 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया था।
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